यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

( १४ )


चलता तो उसे हम कोरी कल्पना कहते-जिसे उपन्यास या नाटक लिखनेवाले प्रायः अपने अधिकार के भीतर समझते हैं- पर राखालबाबू ऐसे पुरातत्व-व्यवसायी के इस मानने को हमें अनुमान कोटि के भीतर ही रखना पड़ता है। भारत के इतिहास में वह काल ही ऐसा है जिसमें अनुमान की बहुत जगह है। देवगुप्त किस प्रकार महासेनगुप्त के पुत्र अनुमित हुए हैं इसका उल्लेख पहले हो चुका है।

सन् ६०६ ई० में राज्यवर्द्धन मारे गए और हर्षवर्द्धन थानेश्वर के राजसिंहासन पर बैठे। इस काल में हम शशांक को गौड़ या कर्ण-सुवर्ण का अधीश्वर पाते हैं। अपने बड़े भाई के बध का बदला लेने के निमित्त हर्ष के चढ़ाई करने का उल्लेख भर बाण ने अपने हर्षचरित में किया है। यहीं पर उनकी आख्यायिका समाप्त हो जाती है। इससे निश्चय है कि मगध और गौड़ पर अधिकार तो उन्होंने किया पर शशांक को वे नहीं पा सके। गंजाम के पास सन् ६१६-२० का एक दानपत्र मिला है जो शशांक के एक सामंत सैन्यभीति का है। इससे जान पड़ता है कि माधवगुप्त के मगध में प्रतिष्ठित हो जाने पर वे दक्षिण की ओर चले गए और कलिंग, दक्षिण कोशल आदि पर राज्य करते रहे । सन् ६२० में हर्षवर्द्धन परम प्रतापी चालुक्यराज द्वितीय पुलकेशी के हाथ से गहरी हार खाकर लौटे थे। ६२० के कितने पहले शशांक दक्षिण में गए इसका ठीक ठीक निश्चय नहीं हो सकता । सन् ६३० ई० में चीनी यात्री हुएन्सांग भारतवर्ष में आया और १४ वर्ष रहा । उस समय शशांक कर्णसुवर्ण में नहीं थे। शशांक कब तक जीवित रहे इसके जानने का भी कोई साधन नहीं है। हर्षवर्धन से अवस्था में शंशाक बहुत बड़े थे। हर्षवर्धन की मृत्यु सन् ६४७ या ६४८ में हुई । इसके पहले ही शशांक की मृत्यु हो गई होगी क्योंकि हर्षवर्द्धन ने अनेक देशों को जय करते हुए सैन् ६४३ में गंजाम पर जो चढ़ाई की थी उसके अंतर्गत शशांक का कोई उल्लेख नहीं है। यदि अपने परम