पृष्ठ:वैशाली की नगरवधू.djvu/६१

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अपनी जीभ बाहर निकाली और चुटकी ढीली कर दी। नाग ने फूं कर के बाला की जीभ पर दंश किया और उलट गया।

आचार्य ने सन्तोष की दृष्टि से राजपुरुष की ओर देखा। बाला ने सर्प को अपने गले से खींचकर दूर फेंक दिया। वह क्रुद्ध दृष्टि से आचार्य को देखती रही। सर्प निस्तेज होकर एक कोने में पड़ा रहा। बाला के मस्तक पर स्वेदबिन्दु झलकने लगे। यह देखकर तरुण का सारा शरीर भय से शीतल हो गया।

आचार्य ने एक लम्बी लौह-शलाका से सर्प को अर्धमूर्च्छित अवस्था में उठाकर पिटक में बन्द कर दिया और मद्यपात्र आगे सरकाकर स्नेह के स्वर में कहा—"मद्य पी ले कुण्डनी।" बाला ने मद्यपात्र मुंह से लगाकर गटागट सारा मद्य पी लिया।

राजपुरुष ने अब मुंह खोला। उन्होंने कहा—"ठीक है आचार्य, मैं कल प्रातःकाल ही कुण्डनी को चम्पा भेजने की व्यवस्था करूंगा, परन्तु यदि आप जाते तो..."

"नहीं, नहीं, राजकार्य राजपुरुषों का है—मेरा नहीं।" आचार्य ने रूखे स्वर से कहा। फिर युवती की ओर लक्ष्य करके कहा—

"कुण्डनी, तुझे अंगराज दधिवाहन पर अपने प्रयोग करने होंगे, पुत्री!"

कुण्डनी विष की ज्वाला से लहरा रही थी। उसने सर्पिणी की भांति होंठों पर जीभ का पुचारा फेरते हुए, भ्रांत नेत्रों से आचार्य की ओर देखकर कहा—"मैं नहीं जाऊंगी पिता, मुझ पर दया करो।"

आचार्य ने कठोर स्वर में कहा—"मूर्ख लड़की, क्या तू राजकाज का विरोध करेगी?"

"तो आप मार डालिए पिता, मैं नहीं जाऊंगी।"

आचार्य ने फिर चाबुक उठाया। तरुण अब अपने को आपे में नहीं रख सका। खड्ग ऊंचा करके धड़धड़ाता गर्भगृह में घुस गया। उसने कहा—"आचार्यपाद, यह घोर अन्याय है, यह मैं नहीं देख सकता।"

आचार्य और राजपुरुष दोनों ही अवाक् रह गए। वे हड़बड़ाकर खड़े हो गए। राजपुरुष ने कहा—

"तू कौन है रे, छिद्रान्वेषी? तूने यदि हमारी बात सुन ली है तो तुझे अभी मरना होगा।"

उन्होंने ताली बजाई और चार सशस्त्र योद्धा गर्भगृह में आ उपस्थित हुए। राजपुरुष ने कहा—"इसे बन्दी करो।"

युवक ने खड्ग ऊंचा करके कहा—"कदापि नहीं!"

आचार्य ने कड़ी दृष्टि से युवक को ताककर उच्च स्वर से कहा—

"खड्ग रख दो, आज्ञा देता हूं।"

एक अतर्कित अनुशासन के वशीभूत होकर युवक ने खड्ग रख दिया। सैनिकों ने उसे बांध दिया।

राजपुरुष ने कहा—"इसे बाहर ले जाकर तुरन्त वध कर दो।"

आचार्य ने कहा—"नहीं, अभी बन्द करो।"

राजपुरुष ने आचार्य की बात रख ली। सैनिक तरुण को ले गए। आचार्य ने