पृष्ठ:वैशाली की नगरवधू.djvu/५०२

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

153. दृग -स्पर्श पाटलिग्राम पहुंचकर सेनापति सिंह ने वहां का निरीक्षण किया । बस्ती के अधिकांश घर सूने पड़े थे। बहुत - से आग से जलकर ढह गए थे। बड़ी - बड़ी अट्टालिकाओं के ध्वंस ही रह गए थे। राजमार्ग कूड़ा - कर्कट और गन्दगी से भरे थे। खेत उजाड़ और सूखे पड़े थे। गंगा कूल पर जहां घाट था , वहां बड़ा भारी गढ़ा हो गया था , वह दल - दल से भरा था । उसमें बहुत - से हाथी पूरे धंस गए थे, बहुत मर चुके थे, बहुत निरुपाय अपनी सूंड़ें हिला रहे थे। मागधों ने अपने घायलों का कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया था । मागध स्कन्धावार सर्वथा नष्ट - भ्रष्ट हो गया था । मागधों से छीने गए शस्त्रास्त्रों तथा सामग्री से भरी नावें अन्धाधुन्ध उल्काचेल की ओर जा रही थीं । काप्यक गान्धार ने दो दिन में बहुत व्यवस्था कर ली थी । सिंह के पहुंचने पर उसने कहा - “ अम्बपाली से कोई वस्तु नहीं छीनी गई है, न नागरिकों को कोई असुविधा हुई है । " सिंह ने आहतों से भरे युद्ध- क्षेत्र का निरीक्षण किया । धूप और गर्मी से उनके घाव सड़ गए थे और उनकी बड़ी दुर्दशा हो रही थी । उन्होंने काप्यक गान्धार से कहा - “ मित्र , घायल मागधों की भी हमें सेवा करनी चाहिए। " उन्होंने तुरन्त ताड़ - पत्र पर एक आदेश आचार्य अग्निवेश के नाम वेग से चलने वाली नाव पर उल्काचेल भेज दिया । उसमें कुछ वद्य और औपचारिक तथा शुश्रूषा - सामग्री की मांग की गई थी । चर को भेजकर सिंह ने कहा - “मित्र काप्यक, कुछ खाली घरों को स्वच्छ करके आहत भटों को वहां ले जाओ। तब तक आचार्य अग्निवेश अपना सेवादल भेज देंगे। लिच्छवि सेनापति के करुण व्यवहार और अभयदान से आशान्वित हो बहुत - से ग्रामवासी , जो वन में जा छिपे थे, पीछे लौट आए। उनमें से जो उपस्थित हो सके , उन ग्राम -जेट्ठकों को बुलाकर सिंह ने एक घोषणा द्वारा उन्हें अभय किया और मागध आहतों की सेवा में सहयोग मांगा । जेट्ठकों ने प्रसन्नता से सहयोग दिया । सब व्यवस्था कर सिंह ने काप्यक गान्धार को उल्काचेल का भार सौंपकर कहा - “मित्र , वहां झुण्ड के झुण्ड बन्दी आ रहे हैं , उन्हें छोटी - छोटी टुकड़ियों में बांटकर देश के भीतरी भागों में भेजते जाओ और अपनी सैन्य को व्यवस्थित रूप में पीछे हटाओ, तथा यहां की सब सूचनाएं अब तुम्हीं देखो । मैं सन्धि उद्वाहिका में जाऊंगा, मेरा अश्व मंगा दो । " इतना कहकर सिंह ने बैठकर कुछ आदेश लिखे और उन्हें काप्यक को दिया । फिर उसे आलिंगन कर वैशाली के राजपथ पर अश्व छोड़ दिया ।