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वैदेही-वनवास

कुछ क्षण रह कर मौन कहा गुरुदेव ने।
नृपवर यह ससार म्वार्थ - सर्वम्ब है।
आत्म - परायणता ही भव मे है भरी।
प्राणी को प्रिय प्राण समान निजस्व है ॥३३

अपने हित साधन की ललकों में पडे ।
अहित लोक लालों के लोगों ने किये ॥
प्राणिमात्र के दुख को भव - परिताप को।
तृण गिनता है मानव निज सुख के लिये ॥३४॥

सभी सॉसते सह बलाओ में फंसे ।
करे लोग विकराल काल का सामना ।।
तो भी होगी नहीं अल्प भी कुण्ठिता ।
मानव की ममतानुगामिनी कामना ।।३५।।

किसे अनिच्छा प्रिय इच्छाओं से हुई।
वांछाओं के बन्धन मे हैं बद्ध सब ।।
अर्थ लोभ से कहाँ अनर्थ हुआ नही ।
इष्ट सिद्धि के लिये अनिष्ट हुए न कव ॥३६॥

ममता की प्रिय - रुचियाँ वाधाये पड़े।
बन जाती जनता निमित्त हैं ईतियाँ ।।
विबुध - वृन्द की भी गत देती हैं बना ।
गौरव - गर्वित - गौरवितों की वृत्तियाँ ॥३७॥