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तृतीय सर्ग

विपिन कैसे होगा विचलित ।
हुए कुछ कुजन्तुओं का डर ॥
किये कुछ पशुओ के पशुता।
विकपित होगा क्यों गिरिवर ॥६४॥

धरातल क्यों धृति त्यागेगा।
कुछ कुटिल काकों के रव से ।।
गगन तल क्यों विपन्न होगा।
केतु के किसी उपद्रव से ॥६५॥

मुझे यदि आज्ञा हो तो मैं।
पचा दूँ कुजनो की वाई ।।
छुडा दूं छील छाल करके ।
कुरुचि उरकी कुत्सित काई ॥६६।।

कहा रिपुसूदन ने सादर ।
जटिलता है वढ़ती जाती ।।
बात कुछ ऐसी है जिसको ।
नहीं रसना है कह पाती ।।६७।।

पर कहूँगा, न कहूँ कैसे।
आपकी आज्ञा है ऐसी ॥
वात मथुरा मण्डल की मैं।
सुनाता हूँ वह है जैसी ॥६८।।