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वैदेही-वनवास

उचित है, है अत्यन्त पुनीत ।
लोक आराधन की नृप - नीति ।।
किन्तु है सदा उपेक्षा योग्य ।
मलिन-मानस की मलिन प्रतीति ।।४९।।

भरा जिसमें है कुत्सित भाव ।
द्वेप हिंसामय जो है उक्ति ।।
मलिन करने को महती-कीर्ति ।
गढ़ी जाती है जो बहु युक्ति ॥५०॥

वह अवांछित है, है दलनीय।
दण्ड्य है दुर्जन का दुर्वाद ॥
सदा है उन्मूलन के योग्य ।
अमौलिक सकल लोक अपवाद ।।५१।।

जो भली है, है भव हित पूर्ति ।
लोक आराधन सात्विक नीति ॥
तो बुरी है, है स्वयं विपत्ति ।
लोक - अपवाद - प्रसूत - प्रतीति ॥५२॥

फैल कर जन - रव रूपी धूम ।
करेगा कैसे उसको म्लान ।।
गगन में भूतल में है व्याप्त ।
कीर्ति जो राका-सिता समान ॥५३।।