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तृतीय सर्ग

अन्य जन अथवा जो हैं विज्ञ ।
विवेकी हैं या हैं मतिमान ॥
जानते हैं जो मन का मर्म ।
जिन्हें है धर्म कर्म का ज्ञान ॥३४॥

सुने ऐसा असत्य अपवाद ।
गूंद लेते हैं अपने कान ॥
कथन कर नाना - पूत - प्रसग ।
दूर करते है जन - अज्ञान ॥३५॥

ज्ञात है मुझे न इसका भेद ।
कहाँ से, क्यों फैली यह बात ॥
किन्तु मेरा है यह अनुमान ।
पतित - मतिका है यह उत्पात ॥३६॥

महानद - सबल - सिधु के पार ।
रहा जो गन्धर्वो का राज ॥
वहाँ था होता महा - अधर्म ।
प्रायशः सद्धर्मो के व्याज ॥३७॥

कहे जाते थे वे गन्धर्व ।
किन्तु थे दानव सहश दुरंत ॥
न था उनके अवगुण का ओर।
न था अत्याचारों का अन्त ॥३८॥