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वैदेही-वनवास

आत्रेयी कहती थी बारह बरस में।
नही गये थे आप एक दिन भी वहाँ॥
कहाँ वह अलौकिक पल पल का सम्मिलन ।
और लोक - कम्पितकर यह अमिलन कहाँ॥७४||

कभी जनकजा जीती रह सकती नही।
जो न सम्मिलन - आशा होती सामने ।।
क्या न कृपा अब भी होवेगी आपकी ।
लोगों को क्यों पड़े कलेजे थामने ॥७५।।

संयत हो यह कहा लोक - अभिराम ने।
देवि ! आप हैं जनकसुता - प्रिय - सहचरी । ,
हैं विदुषी हैं, कोमल - हृदया आपके -
अन्तस्तल में उनकी ममता है भरी ॥७६।।

उपालम्भ है उचित और मुझको स्वयं ।
इन बातों की थोड़ी पीड़ा है नही ॥
किन्तु धर्म की गति है सूक्ष्म कही गई।
जहाँ सुकृति है शान्ति विलसती है वहीं ॥७७॥

लोकाराधन राजनीति - सर्वस्व है।
हैं परार्थ, परमार्थ, पंथ भी अति - गहन ।
पर यदि ए कर्तव्य और सद्धर्म हैं।
सहन - शक्ति तो क्यों न,करे संकट सहन ॥७८।।