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चतुर्दश सर्ग

तपे हुए की शीतलता है औषधी ।
सहनशीलता कुल कलहों की है दवा ।।
शान्त - चित्तता का अवलम्बन मिल गये ।
प्रकृति - भिन्नता भी हो जाती है हवा ॥११९।।

कोई प्राणी दोप - रहित होता नही।
कितनी दुर्वलताये उसमे है भरी ॥
किन्तु सुधारे सब बाते . है सुधरती ।
भलाइयों ने सब बुराइयाँ हैं हरी ॥१२०॥

सभी उलझने सुलझाये है सुलझती।
गॉठ डालने पर पड़ जाती गॉठ है॥
रस के रखने से ही रस रह सका है।
हरा भरा कब होता उकठा - काठ है ॥१२१॥

मर्यादा, कुल - शील, लोक - लज्जा तथा।
क्षमा, दया, सभ्यता, शिष्टता, सरलता ॥
कटु को मधुर सरसतम असरस को वना ।
है कठोर उर में भर देती तरलता ॥१२२॥

मधुर - भाव से कोमल - तम - व्यवहार से ।
पशु - पक्षी भी हो जाते आधीन हैं।
अनहित हित वनते स्वकीय परकीय है।
क्यों न मिलेगे दम्पति जो जलमीन है॥१२३॥