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वैदेही-वनवास

देख प्रकृति की कुत्सित - कृतियों को दुखित ।
मैं भी वैसी ही हूँ जैसी आप हैं।
किसको रोमाञ्चित करते हैं वे नहीं ।
भव में भरे हुए जितने संताप हैं॥६४॥

इस प्रकार के भी कतिपय - मतिमान हैं।
जो दुख मे करते है सुख की कल्पना॥
अनहित में भी जो हित हैं अवलोकते ।
औरों के कहने को कहकर जल्पना ॥ ६५ ।।

जो हो, पर परिताप किसे हैं छोड़ते ।
है विडम्बना विधि की बड़ी - बलीयसी ॥
चिन्तित विचलित बार बार बहु आकुलित ।
किसे नही करती प्रवृत्ति - पापीयसी ।। ६६ ।।

विवुध - वृन्द ने क्या बतलाया है नही । -
निगमागम में सब विभूतियाँ हैं भरी ॥
किन्तु पड़ प्रकृति और परिस्थिति - लहर में।
कुमति - सरी में है डूबती सुमति - सरी॥६७॥

सारे - मनोविकार हृदय के भाव सब ।
इन्द्रिय के व्यापार आत्महित - भावना ॥
सुख - लिप्सा गौरव - ममता मानस्पृहा ।
स्वार्थ सिद्धि - रुचि इष्ट - प्राप्ति की कामना ॥ ६८॥