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वैदेही-वनवास

कहा राम ने आज राज्य जो सुखित है।
जो वह मिलता है इतना फूला फला ॥
जो कमला की उस पर है इतनी कृपा।
जो होता रहता है जन जन का भला ।।४१।।

अवध पुरी है जो सुर - पुरी सदृश लसी।
जो उसमें है इतनी शान्ति विराजती ॥
तो इसमें है हाथ बहुत कुछ प्रिया का।
है यह बात अधितकर जनता जानती ॥४२॥

कुछ अशान्ति जो फैल गई है इन दिनों।
वे ही उसका वारण भी. हैं कर रही ।
विविध - व्यथाये सह बह विरह - प्रवाह में ।
वे ही दुख - निधि में हैं अहह उतर रही ॥४३॥

भला कामना किसको है सुख की नहीं।
क्या मैं सुखी नही रहना हूँ चाहता ।।
क्या मैं व्यथित नही हूँ कान्ता - व्यथा से ।
क्या मैं सद्रत को हूँ नहीं निबाहता ॥४४॥

तन, छाया - सम जिसका मेरा साथ था।
आज दिखाती उसकी छाया तक नहीं ।।
प्रवह - मान - संयोग - स्रोत ही था जहाँ ।
अब वियोग - खर - धारा बहती है वही ॥४५॥