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वैदेही-वनवास

स्वाभाविक स्नेह
भव - जीव - मात्र है पाता ।।
कर भला तुमारा मानस ।
है विकच - कुसुम बन जाता ॥६३॥

प्रति दिवस तुमारा दर्शन ।
देवता - सहश थी करती ।।
अवलोक - दिव्य - मुख - आभा ।
निज हृदय – तिमिर थीं हरती ॥६४॥

अव रहेगा न यह अवसर ।
सुविधा दूरीकृत होगी।
विनता बहनों की विनती।
आशा है स्वीकृत होगी ।।६५।।

माण्डवी का कथन सुन कर ।
मुख पर विलोक दुख - छाया ।
बोली विदेहजा धीरे।
नयनों में जल था आया ।।६६।।

जर्जरित - गात अति - वृद्धा।
हैं तीन तीन माताएँ ।
जिन्हें घेरती रहती।
आ आ कर दुश्चिन्ताये ॥६७॥