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दशम परिच्छेद
 

ले जाय, तो रोजाबिलाने लज्जा से आँखें नीची कर लीं और हिचकी कि फ्लोडोआर्डो के हाथ में अपना हाथ दूँ वा नहीं। सच पूछिये तो मेरी अनुमति तो यह है कि यदि ऐसे अवसर पर कोई अपर स्त्री होती तो उसे भी अपनी सुध बुध न रहती, क्योंकि फ्लोडोआर्डा ऐसा ही स्वरूपमान युवक था कि जिसके निरीक्षण से मनुष्य का मन तत्काल हाथ से जाता रहे।

निदान उसने रोजाबिला को हाथ अपने हाथ में लिया और उसे नृत्यालय में ले गया। वहाँ प्रत्येक ओर हर्ष और सुखकी सामग्री प्रस्तुत थी। बाद्यों और गायको के मृदुनादों से सम्पूर्ण आयतन गूँजरहा था, नर्तकों की पद परिचालना और उनकी ठोकरों से पृथ्वी थर्रा रही थी स्वरूपमान लोगो के सहस्रों लघु लघु समूह उडु गणा की भाँति यत्र तत्र छिटके हुए थे। जिनके परिच्छद और धृत रत्नों के प्रकाश ने निशाको दिवस बना दिया था। रोज़ाविला और फ्लोडोआर्डो उन लोगों में से होते हुये आयतन के दूसरे सिरे पर निकल गये और वहाँ एक खुली हुई खिड़की के सामने खड़े हुये। कतिपय पल पर्य्यन्त वह लोग स्तब्ध रहे। कभी वह एक दूसरे को तकते कभी नर्तकों की ओर दृष्टिपात करते और कभी मृगांक माधुर्य्य को देखते और फिर सभों को भूल कर निज बिचारों में मग्न हो जाते। निदान फ्लोडोआर्डो ने कहा "राजात्मजे! इससे बढ़ कर भी कोई अभाग्य की बात हो सकती है?" यह सुन कर रोजाबिला अकस्मात् अपने विचारों से चौंकपड़ी और बोली "ऐं अभाग्य? कैसा अभाग्य? महाशय! यहाँ कौन अभागा है?"

फ्लोडोआर्डो―"और कौन; उस व्यक्ति के अतिरिक्त जो स्वर्गीय व्यजनों को देखता हो और उनसे बञ्चित रहे, जो तृषा से कण्ठ गत प्राण हो परन्तु शीतल जल का पानपात्र जो सम्मुख