पृष्ठ:वेनिस का बाँका.djvu/११

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बहुत थोड़ी है। इसके अतिरिक्त उस समय एक विचार यह भी फैला हुआ था, कि इस प्रणाली के ग्रहण करने से ही, हिन्दी भाषा की समुन्नति होगी, क्योंकि लोग समझते थे कि ऐसा करने से ही, हिन्दी के शब्दभाण्डार पर सर्व साधारण का अधिकार होगा। उक्त बाबू साहब भी इसी विचार के थे। वे पाठशाला के छात्रों को भी इस विषय में उत्साहित करते रहते, और उन छात्रों को विशेष आदर की दृष्टि से देखते, जो बातचीत में भी किसी अरबी फारसी शब्द का प्रयोग न कर संस्कृत गर्भित हिन्दी बोलते। वे ऐसे छात्रो को प्रायः पुरस्कृत भी करते। उनकी इच्छा के अनुसार जब 'वेनिस का बाँका' शुद्ध हिन्दी में तैयार हो गया, तब उसे देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्हीं के उद्योग से वह कलकत्ते के 'आर्यावर्त प्रेस में छपा भी।

एक तो ग्रन्थ की भाषा यों ही क्लिष्ट थी, दूसरे वह पड़ा आर्य समाजी सज्जनों के हाथ में उन्होंने अपनी इच्छा के अनुसार भी उसमें कुछ परिवर्तन किये कुछ मनमाने संशोधन भी हुए जिसका फल यह हुआ कि ग्रन्थ जैसा चाहिए वसा शुद्ध-न छप सका, और उसकी भाषा यत्र-तत्र और लिष्ट हो गई। इतना होने पर भी ग्रन्थ का आदर हुआ, और वह हाथों हाथ बिका। स्वर्गीय पण्डित प्रतापनारायण मिश्र अपने 'ब्राह्मण' पत्र में उसकी लम्बी चोड़ी प्रशंसा की, अन्य सामाजिक पत्रों ने भी उसे सराहा, इसलिये उसके सम्मान की मात्रा बढ़ गई। हिन्दी शब्द सागर की रचना के लिये शब्द संग्रह करने के उद्देश्य से जो ग्रन्थ चुने गये। उनमें "वेनिस का बाँका" भी लिया गया। इसी कारण कि उसमें संस्कृत शब्दों की प्रचुरता है, और उस समय लोगों की दृष्टि में उसकी प्रतिष्ठा थी।