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त्रयोदश परिच्छेद
 

मेरे इस अपराध को क्षमा करें, अगत्यो मैं कभी ऐसे प्रश्न न करूँगा"।

यह कह कर वह चुप हो गया और रोजाबिला भी चुप रही। उस समय उन दोनों प्रेमियों के हृदयके अतिरिक्त प्रत्येक ओर सन्नाटा था, यद्यपि वे अपनी रसना से निज प्रच्छन्न प्रीतिका भेद नहीं कहते थे, यद्यपि रोजाबिला ने अपने मुख से न कहा था कि फ्लोडोआर्डो तूही वह पुरुष है जिसे यह सुमन मिलेगा, और यद्यपि फ्लोडोआर्डो की जिह्वासे न निकला था कि रोजा- विला वह लाला और जो वस्तुयें उससे प्रकट होती हैं मुझी को दो। तथापि उनकी आँखें चुप न थीं। इन कुटनियोंने जो लोगों के विचारों को तत्काल समझ लेती हैं एकद्वितीक्लय से बहुत कुछ भेद जो उनके हृदयोने अद्यावधि स्वयं उन पर प्रकट नहीं किये थे, कह दिये। फ्लोडोआर्डो और रोजाबिला एक द्वितीय को ऐसी दृष्टियों से अवलोकन कर रहे थे कि समालाप को कोई आवश्यकता न थी। जब फ्लोडोआर्डो की आंख रोजाबिला पर पड़ती थी तो वह एक अत्यन्त प्रिय कटाक्ष के साथ जिससे सर्वथा प्रीति टपकती थी मुसकराती थी और फ्लोडोआर्डो भय और आशा की दृष्टि से उसके अर्थ का अनुधा- वन करता था। निदान उसने उसके अभिप्रायको समझ लिया जिससे उसके हृदय की उद्विग्नता और बढ़ गई और चक्षुओं पर एक मद सा छा गया। यह दशा देख कर रोजाविला काँपने लगी क्योंकि उसकी आँखें उसकी दृष्टि की तीव्रता को नहीं सहन कर सकती थीं। इसी अशक्तता की दशा में फ्लोडोआर्डो रोजाविला के जलजात पदों पर गिरकर अत्यन्त विनीत और नम्रता और गिड़गिड़ाहट के साथ कहा "रोजाविला परमेश्वर के लिये मुझे वह पुष्प प्रदान करो।"