पृष्ठ:वेद और उनका साहित्य.djvu/३९

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प्रथम अध्याय] ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि अग्नि, वायु और सूर्य क्रमशः ऋक- यजु और साम हुए १ । इसके संबंध में सायण कहता है- "नचजीव विशेपैरग्नि वारबादित्यैर्वेदानामुत्पादितत्वम् । ईश्वरस्याग्न्यादि प्रेरकत्वेन निर्मातृत्वात् ॥ ऋ० भा० ३ । सायण ने वेदार्थ शैली के विषय में लिखा है कि हम ब्राह्मण, दो कल्प सूत्र (पापस्तम्भ-और बौधायन), मीमांसा तथा व्याकरण की सहायता से वेद का अर्थ करते हैं। इसी क्रम से उनने यजुर्वेद का पूरा भाष्य लिखा है। ऋक संहिता भाष्य में अनुक्रमणि का, निरुक्त, व्याकरण, और ब्राह्मण का उदाहरण देकर संशयास्पद स्थलों पर अनेक प्रमाणों से मन्त्रों का सरल तथा निश्चित अर्थ किया है। श्रौत सूत्रों तथा ब्राह्मणों में ऋक्-यजु-और साम वेद के मंत्रों का विशेष विशेष यज्ञों में जिस समय जिस रूप में श्राव- श्यकता पड़ती है वह निर्दिष्ट है। सायण ने उसका किसी तरह भी उल्लंघन न करके अर्थ किया है। सायण के भाप्यों में ऋग्वेद भाप्य बहुत प्रशंसित है । ऋग्वेद की भापा क्लिष्ट भी है । सायण के पूर्व निरुक्तकार यास्क को छोड़कर और किसी की टीका ऋग्वेद पर न थी। निरुक्त में भी कुछ मन्त्रों पर ऊहापोह है । सायण ने ही सर्व प्रथम यह दुर्धर्प कार्य किया है। निरुक्त की कुछ मन्त्र-च्याख्याओं से तथा कुमारिल भह के तन्त्र चार्तिक के कुछ वैदिक व्याख्यानों के विवरण से यह ज्ञात होता है कि चेद मन्त्रों के अर्थ आधिदैविक, प्राधिभौतिक और आध्यात्मिक होते हैं । गीता में भी इसका जिक्र है ®। सर्ववर्ती ब्रह्म को अध्यात्म, पृथ्वी १ एवाग्नेरजायत यजुवेंदोबायोः सामवेद थादित्यात् । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं क्षरोभावः पुरुपश्चाधि दैवतम् । १३ -