पृष्ठ:वेद और उनका साहित्य.djvu/२०३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

नयाँ अध्याय ] समय घेता के प्रारम्भ -- "पि पूछने लगे कि स्वायंभुव मनु के युग में यज्ञ का प्रचार कैसे हुआ ? सतयुग के साथ उस युग का संधिकाल समाप्त होने के पश्चात्-त्रेता युग प्रवृत्त होने पर (?) कैसी व्यवस्था शुरु हुई ? ग्राम पुर नगर आदि की रचना होने के पश्चात्, कृषि प्रादि से धौषधियों की उत्पत्ति होने के अनन्तर जीवन साधन के नाना दाम धंधे शुरू होने के पोछे उन वेदोक्त मंत्रों से यज्ञ का प्रचार किस ढङ्ग से शुरू हुधा?" यह सुनकर सूतनी बोले वैदिक मन्त्रों का विनियोग यज्ञ कर्म से करके विश्व-भुक् इन्द्र ने यज्ञ का प्रचार किया। देवताओं का संगठन किया-सब यज्ञ के साधन इकठे किये और अश्वमेध का प्रारभ हुया । निसमें अनेक महर्पि भी आये थे। इस यज्ञ में अनेक ऋत्विज् अनेक प्रकार के हवि, अग्नि के अर्पण करने लगे । जब सुस्वर साम गान होने लगा और पशुओं का पालंभन चलने लगा यज्ञ का सेवन करनेवाले देव- गण जब श्याहूत हुए-उस समय दीन पशुगणों को अवलोकन करके महर्षि गण उठे और इन्द्र से पूछने लगे कि तुम्हारी यज्ञ विधि क्या है ? यह तो बड़ा धर्म है कि धर्म के नाम से श्रधर्म हो रहा है। यह पशु हवन विधि तो अनुचित है । तूने यह धर्म का नाश करने के लिये ही पशु मारकर अधर्म शुरू किया। यह धर्म नहीं है-अधर्म है। तुझे यज्ञ करना है तो यज्ञीय धान्य के बीजों से ही यज्ञ करो।" इस प्रकार ऋपियों ने कहा परन्तु इन्द्र ने नहीं माना । "तब इन्द्र और ऋपियों में बड़ा विवाद छिड़ गया। यज्ञ जंगम वस्तुओं से हो या स्थावरों से ? यही विवाद था । जय ऋषि थक गये तब वे दुखी होकर सम्राट् वसु के पास गये। “पि वोले हे उत्तानपाद के वंशधर ! तूने कैसो यज्ञ-विधि देखो है-सो कह !