पृष्ठ:वेद और उनका साहित्य.djvu/१०१

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[ वेद और उनका साहित्य म्वती उनका प्रधान कार्य था, खेती के सामान-हल बैलगाड़ी इकडा, पहिया, धुरा, जुन्या, धादि--का बार बार उल्लेख साया है। बहुत मे कुल पनि थपने परिवार के साथ उत्तम चराहगाहों की खोज मे भारत मे भागे को बढ़ रहे थे। वे अनार्यों से युद्ध करते थे। युद्ध के शस्र और दंग हम पीछे बता चुके है । स्वर्ण, चाँदी धौर लोहा उन्हें मिल चुका था। वैदिक भार्य गौर वर्ण के, सुन्दर, कद्दावर, पुष्ट, योद्धा, सहिष्णु और बुद्धिमान थे। वे मदा अग्नि साथ रखते थे। वे गम्भीरता से प्रकृति का अध्ययन करते और उसके रहस्यों को मौलिक ढंग से खोजते थे। थायो' को समुद्र और समुद्र यात्राओं का पूरा अनुभव था । स्था- पार में व्यवहार कुशलता बढ़ गई थी और वस्नु यों का यथारत विनिमय होता था। औ और गेहूँ, की खेती मुस्य थी। धार्य लोग मौम खाते थे । नशे की चीज केवल एक मोम बेटी थी जो दूध मिलाकर पी जाती थी; परन्तु जब थार्य पूर्व में दूर तक पहुँच गये तय सोम उन्हे कम मिलने लगा और वे फिर मय बनाकर उससे सोम का काम लेने लगे । उन और सूत को रंग कर सुन्दर वस्त्र बनाने की कला बहुत उन्नत हो गई थी। वे बनों में याग लगा कर उन्हें साफ करने और उसे 'पृथ्वी का मुण्डन' कहने थे। रथ बहुत सुन्दर बनाते थे। स्वर्ण के गहने और लोहे के शस्त्र बहुतायत से बनते थे । गले, हाथ, पैर और मिरों एर भाभुपण पहने जाते थे। लोहे के नगरों का भी जिक्र मिलना है जो कदाचित किले होगे । भवन हजारों खम्भों से युक्त पत्थरों की दीवारों के बनते थे। राना और प्रजापति पिछले दिनों में बन गये थे, वे हाथियों पर मन्त्री के साथ निकलने । यकरे, भेड, साँद, भले और कुत्त' चौका दीया काने थेसिन्धु से सरस्वती सक और पर्वना से समुद तक का समस्त भारन खपद भूग्वेद काल में पायो' ने जीत लिया था। और गंगा तक ,