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कर्मयोग
 

से वे सभी प्रभावित हुये। सभी मन मानो एक स्वर तक खींचे जाकर एक विचार से समान रूप से प्रभावित होंगे। देश काल आदि के कारण विचार के प्रभाव में विभिन्नता अवश्य होगी परन्तु मन के प्रभावित होने की सदा सम्भावना रहती है। मान लीजिये मैं कोई दुष्कर्म कर रहा हूँ। मेरा मन स्पंदन की एक सतह पर है ; संसार के अन्य मन जो उस सतह पर हैं, मेरे स्पंदनों से प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे ही जब कोई अच्छा काम करता हूँ तो मेरा मन स्पंदन की एक सतह पर रहता है। उसी खिंचाव के अन्य मन मेरे मन से प्रभावित हो सकते हैं। मन का यह मन पर प्रभाव मानसिक आकर्षण की घटती-बढ़ती के अनुसार न्यूनाधिक होता है।

इस उदाहरण को थोड़ा और आगे बढ़ाने पर यह नितान्त संभव जान पड़ता है कि जिस प्रकार प्रकाश की लहरें लाखों वर्ष चलकर किसी वस्तु से टकरा सकती हैं, उसी प्रकार विचार- लहरियाँ सैकड़ों वर्ष चलने के बाद किसी ऐसे पदार्थ से मिलें, जो उनके समान स्पंदन करे। अत: यह भी सम्भव है कि हमारा वायु-मंडल पाप और पुण्य दोनों के विचार-स्पंदनों से पूर्ण हो । जब कोई बुरा काम करता है, तो उसका मन स्पंदन की एक निश्चित सतह पर आता है ; उस स्पंदन-क्रिया से समानता रखने- वाली जितनी भी लहरें वायु-मंडल में होंगी, वे उसके मन में हठात् प्रवेश पाने की चेष्टा करेंगी। यही कारण है कि पापी अधिकाधिक पाप करता जाता है। उसकी क्रियायें घनीभूत हो