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कर्मयोग
 

के लिये है, अथवा जैसी कहावत है, हम सोचते हैं कि "हम खाने के लिये जीते हैं," न कि "जीने के लिये खाते हैं"। यह भूल हम सदा किया करते हैं। प्रकृति में आत्मबोध कर हम उसमें आसक्त हो जाते हैं। इस आसक्ति के होते ही आत्मा के बंधन जकड़ जाते हैं; हम स्वतंत्रता के लिये नहीं गुलामी के लिये काम में लग जाते हैं।

इस शिक्षा का तत्त्व यह है कि तुम स्वामी की भाँति कार्य करो, दास की भाँति नहीं। अविराम काम करो, किन्तु दास होकर नहीं। आप देखते नहीं, किस प्रकार प्रत्येक मनुष्य काम करता है। कोई भी एकदम अकर्मण्य नहीं रह सकता। ९९ फीसदी लोग दासों की भाँति काम करते हैं और परिणाम होता है. दुख दैन्य हाहाकार। यह सब स्वार्थी काम हैं। स्वतंत्रता के लिये कार्य कोजिये, प्रेम के लिये, प्रेम शब्द का अर्थ समझना अत्यंत कठिन है;प्रेम स्वतंत्रता से आता है। दास में सच्चा प्रेम असंभव है। दास को खरीदकर उसे जंजीरों में बाँध आप उससे काम करवा सकते हैं, परन्तु उसके हृदय में आपके प्रति तनिक भी प्रेम न होगा। वह दास की ही भाँति काम करेगा। इसी भाँति सांसारिक पदार्थों के लिये जब हम दासों की भाँति कार्य करते हैं, तब हमारे भीतर प्रेम हो नहीं सकता, न हमारा काम ही सच्चा काम हो सकता है। ऐसा ही हमारा अपने बंधु-बांधवों के प्रति काम है, और उससे भी अधिक स्वयं अपने प्रति। स्वार्थी काम दास का काम है। किसी काम को जाँचने के लिये कि वह स्वार्थ-पूर्ण