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कर्मयोग
 

पाने की यही विधि है कि हम कार्य-कारणवाली भूमि से, नियम-निर्दिष्ट सीमाओं से परे चले जायें।

परंतु जीवन की तृष्णा तजना अत्यंत कठिन है: इनेगिने ही कभी वैसा कर पाते हैं। हमारे शाखों में वैसा करने के दो मार्ग वताये गये हैं; एक "तेति-नेति" वाला, यह नहीं, यह नहीं : दूसरा "इति-इति" वाला। पहला खंडनात्मक और दूसरा मंड. नात्मक है। खंडनात्मक प्रणाली सब से कठिन है। आसाधारण मनखिता और दानवी इच्छा-शक्तिवाले पुरुषों के लिये ही वह संभव है जो- उठकर कह देते हैं,-"नहीं, मुझे इसकी आवश्य- कता नहीं" ; मन और शरीर उनकी आज्ञा मान जाते हैं और वे सफल होते हैं। परंतु ऐसे पुरुषों की संख्या अत्यंत न्यून हैं : अधिकांश जन मंडनात्मक, संसार के बीच होकर जानेवाला मार्ग ग्रहण करते हैं; वे उन बंधनों को प्रयोग में लाते हैं जिन्हें वे बाद में तोड़ देते हैं। यह भी एक प्रकार का त्याग है; केवल धीरे-धीरे वस्तुओं को जान कर, उनका आनंद ले, अनुभव प्राप्त करते हुये और वस्तुओं की प्रकृति जानते हुये जब तक कि मन उन्हें छोड़कर अंत में अनासक्त नहीं हो जाता । अनासक्ति का प्रथम मार्ग ज्ञान द्वारा है, दूसरा कर्म और अनुभवों द्वारा । ज्ञान- योग में कर्म का बंधन नहीं माना जाता ; कर्मयोग में कर्म करने से विराम नहीं मिलता। विश्व के प्रत्येक प्राणी को कर्म करना चाहिये । केवल वे जो आत्मा को पाकर पूर्ण रूप से संतुष्ट होते हैं, जिनकी इच्छायें अध्यात्म-केंद्र से विच्युत इधर-उधर जाती