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कर्मयोग
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अवेंगी और हमें सत्य की आध्यात्मिक अनुभूति होगी। यह अनुभूति महती मनःशक्ति का रूप धारण करेगी। पहले अनुभव होगा, तदुपरांत इच्छा होगी; इसी इच्छा में से कर्म की वह अव्यहात शक्ति उत्पन्न होगी जो तुम्हारी शिराओं और धमनियों में प्रवह- मान हो तुम्हारे शरीर को निःस्वार्थ कर्म-योग-साधना का यंत्र बना देगी ; पूर्ण प्रात्म-त्याग और स्वार्थहीनता का अभीप्स्य तब सिद्ध हो जायगा। यह सिद्धि किसी धर्म, संप्रदाय, मत पर निर्भर नहीं। तुम यहूदी हो, ईसाई हो अथवा म्लेच्छ, इससे तात्पर्य नहीं । तुम निःस्वार्थ हो कि नहीं ? प्रश्न तो यह है । यदि हो तो तुम विना एक भी धर्म-ग्रन्थ पढ़े, बिना एक बार भी किसी मंदिर व गिर्जे में गये पूर्णता प्राप्त करोगे। हमारे योगों में से प्रत्येक विना दूसरों की सहायता के भी मनुष्य को पूर्ण बनाने में समर्थ है, क्योंकि उन सबका ध्येय एक ही है । मोक्ष के लिये ज्ञान, भक्ति और कर्म के तीन योग स्वतंत्र और अव्यर्थ साधन हैं। "ज्ञान और कर्म में केवल मूर्ख विभेद करते हैं, बुद्धिमान् नहीं।" बुद्धिमान् जानते हैं, वे यद्यपि देखने में एक दूसरे से भिन्न हैं परंतु सभी समान रूप से मानव पूर्णता के एक ही लक्ष्य की ओर ले जानेवाले हैं।

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