पृष्ठ:विवेकानंद ग्रंथावली.djvu/९७

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है और सदा रहेगा। वह अपना वास्तविक स्वरूप, जो पवित्र- ता है, व्यक्त करने के लिये भिन्न रूपों को धारण करता रहता है। वह काम जो इस उन्नति वा गति का अवरोधक है, पाप कह- लाता है। यही दशा विचार की भी है। इस प्रकार जिस कर्म और विचार से जीव को उन्नति करने में सहायता मिलती है, उसे शुभ वा पुण्य कहते हैं। एक सिद्धांत जिसे द्वैत से लेकर अद्वैत तक सब विचारवाले मानते हैं, यह है कि सारी शक्तियों का आकर हमारे भीतर है, वे कहीं बाहर से नहीं आती हैं। वे आत्मा में प्रसुप्त दशा संन्निहत हैं और सारे जीवन की चेष्टा उन्हीं प्रसुप्त शक्तियों का उद्बोधन करके उन्हें व्यक्त करने के लिये है।

उनका आवागमन का भी सिद्धांत है। उसकी शिक्षा यह है कि शरीर के नष्ट होने पर जीव शरीरांतर में जाता है, चाहे इस लोक में हो वा लोकांतर में हो। पर इस लोक में अन्य लोकों से विशेषता है, क्योंकि यही कर्मभूमि है। अन्य लोक ऐसे हैं जहाँ दुःख कम है; और इसी हेतु वे तर्क लगाते हैं कि वहाँ ऊँची बातों के विचारने का अवसर नहीं मिलता। इस लोक में थोड़ा सा तो सुख है, पर दुःख बहुत है। यहीं जीव कभी कभी जाग पड़ता है और मोक्ष का प्रयत्न करता है। जैसे संपन्न लोगों को इस लोक में ऊँची बातों के सोचने का बहुत कम अवसर मिलता है, वैसे ही स्वर्ग में जीव को जागने का कोई अवसर नहीं है। उसकी दशा वहाँ संपन्न लोगों की सी