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कर्म-वेदांत।
तीसरा भाग।
(लंदन―१७ नवंबर १८९६)

छांदोग्योपनिषद् में एक कथा है कि नारदजी सनत्कुमार के पास गए और उन्होंने अनेक प्रश्न किए, उन्हीं में से एक यह भी है कि क्या सारे पदार्थों की स्थिति धर्म से है? सनत्कुमारजी ने नारद को धीरे धीरे, जैसे कोई बालक को सीढ़ी पर हाथ पकड़कर चढ़ाता हुआ ले जाय, उस विषय को समझाया है। उन्होंने कहा कि पृथ्वी से अमुक श्रेष्ठ है, अमुक से अमुक, और इस प्रकार वे आकाश तक पहुँचे। वे कहते हैं कि आकाश प्रकाश से श्रेष्ठ है, क्योंकि सूर्य्य, चंद्र, विद्युत्, तारे सब आकाश में ही हैं; हम आकाश में रहते हैं और नष्ट होकर आकाश ही में मिल जाते हैं। फिर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या आकाश से भी कुछ श्रेष्ठ है। सनत्कुमारजी ने कहा―वेदांत के अनु- सार प्राण जीवन का हेतु है। आकाश के समान प्राण भी सर्व- व्यापक है। सारी गति जो शरीर में वा और कहीं होती है, प्राण ही के कारण होती है। वह आकाश से भी श्रेष्ठ है। सब प्राणी प्राण ही से जीते हैं। प्राण ही माता में, पिता में, भाई में, बहिन में और आचार्य्य में है। प्राण ही सबका ज्ञाता है।

अब मैं आपको एक और बात सुनाता हूँ। श्वेतकेतु ने अपने पिता से सत्य की जिज्ञासा की। पिता ने बहुत से पदार्थों