पृष्ठ:विवेकानंद ग्रंथावली.djvu/२९९

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सकते हैं, कहीं ऊँचे हैं। ऐसी कल्पनाओं से प्राप्तपुरुष ही उत्तम है। उसी में परिधि पूरी होती है, द्रष्टा और दृग् एक हो जाते हैं। उसी में सारे भ्रमों का अंत है और उसके स्थान में इस ज्ञान का उदय होता है कि ‘मैं सदा पूर्ण ब्रह्म था’। फिर यह बंधन कहाँ से आया? भला यह संभव कैसे है कि यह पूर्ण ब्रह्म विकारी होकर अपूर्ण बन जाय? यह हो कैसे सकता है कि मुक्त बद्ध हो जाय? अद्वैतवाद का कथन है वह कभी बद्ध नहीं था, सदा मुक्त था। आकाश में नाना वर्ण के बादल दिखाई पड़ते हैं। वे क्षणमात्र रहते और फिर तीन तेरह हो जाते हैं। आकाश ज्यों का त्यों शुभ्र नीलवर्ण बना रहता है। आकाश में विकार नहीं होता, बादल में विकार भले ही होता रहे। इसी प्रकार आप सदा पूर्ण हैं, नित्य पूर्ण हैं। आपके स्वरूप को न कोई बदलता है न बदलेगा। यह सारे भाव कि मैं अपूर्ण हूँ, पुरुष हूँ, स्त्री हूँ, पापी हूँ, मन हूँ, बुद्धि हूँ, मैंने सोचा, मैं विचारूँगा, इत्यादि सब मृगतृष्णावत् हैं। आप कभी सोचते नहीं, कभी आपके शरीर नहीं था, आप कभी अपूर्ण नहीं थे। आप इस विश्व के आनंदमय अधिपति हैं―सब भूत और भविष्य के एकमात्र शासक, सर्वशक्तिमान, सूर्य्य, चंद्र, तारा, ग्रहोपग्रह, पृथिवी, समस्त जगत् के एकमात्र शासक। आपके ही कारण सूर्य्य में प्रकाश है, आप ही तारों को चमकाते हैं, आप ही से पृथ्वो सुंदर देख पड़ती है। यह आपकी महिमा है कि सब परस्पर प्रेम करते और आकृष्ट हो रहे हैं। आप सब में