पृष्ठ:विवेकानंद ग्रंथावली.djvu/१५०

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एक बड़ा गोला दिखाई पड़ता है। मान लीजिए कि वह सूर्य्य की ओर एक फोटो का केमरा लेकर जाता है और अपनी यात्रा में स्थान स्थान से उसकी प्रतिकृति लेता जाता है और सूर्य्य के पास पहुँच जाता है। एक स्थान की प्रतिकृति दूसरे स्थान की प्रतिकृति से भिन्न जान पड़ सकती है; और जब वह लौटकर आता है, तब वह स्थान स्थान की ली हुई प्रतिकृतियों को लाकर आपके सामने रख देता है। वे भिन्न भले ही हों, पर वे सब एक ही सूर्य्य की प्रतिकृतियाँ हैं हम लोग जानते हैं कि वे सब एक ही सूर्य की प्रतिकृतियाँ हैं जो उसने भिन्न भिन्न स्थितियों से ली हैं। यही दशा ईश्वर की भी है। ऊँचे और नीचे दर्शनों में, अति परिष्कृित और भोंड़े पुराणों में, अति श्रेष्ठ और भावपूर्ण कर्मकांड से लेकर भूत-प्रेत की पूजा तक में, सब मनुष्य, सब जातियाँ, जानकर हो वा अनजान में, उसी ईश्वर की भावना कर रही हैं, उसी की ओर जा रही हैं। मनुष्य सत्य का जा कुछ आभास देख रहा है, उसी का आभास है, दूसरे का कहीं है। मान लीजिए कि हम सब अपने हाथों में पात्र ले लेकर तालाब में पानी भरने जाते हैं। जिसके पास कटोरा है, वह कटोरे में भरता है; जिसके पास घड़ा है, वह घड़े में भरता है। इसी प्रकार सब जल लाते हैं और पानी पात्र के आकार का हो जाता है। पर है सब पानी ही। वही भिन्न भिन्न पात्रों में तदाकार भासमान हो रहा है। यही दशा धर्म की भी है। हमारे चित्त पात्रवत् हैं; और सब