पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४०८

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४१३ विनय-पत्रिका तो) प्रभुका महान् वडप्पन और कहॉ मेरी छोटी-सी क्षुद्रता, कहाँ तो प्रभुकी पवित्रता और कहॉ मेरे पापोंकी अधिकता ॥१॥ इन दोनों ओरकी बातोंपर विचार करके मन संकोचके मारे सहम जाता है (कुछ कहनेकी हिम्मत नहीं होती, पैर पीछे पड़ने लगते हैं ), 'परन्तु खामीकी सुन्दर साधुता (शरणागत कैसा भी दीन-हीन- मलिन हो, आप उसको आदरके साथ अपना ही लेते हैं) को सुनकर यह मन फिर सम्मुख जाता है। हे नाथ ! आपके गुणोंकी गाथाओंको गानेसे और हाथ जोडकर मस्तक नवानेसे आपने नीचोंको भी निहाल कर दिया है (यह आपके प्रेमकी रीतिकी चतुरताहै)॥२॥ इस दरवारमें गर्वसे सर्वनाश हो जाता है और गरीबी एवं नम्रतासे ही योग-क्षेमकी प्राप्ति होती है। रावण-सरीखा तो कोई प्रतापी नहीं था और विभीपणके समान कोई दीन-दुर्बल नहीं था। परन्तु इस प्रसङ्गमे आपकी प्रेमकी पराधीनता ही ( स्पष्ट ) समझमें आती है। ( शरणागत दीन विभीषणको लङ्काका राज्य और अपनी अनन्य भक्तिका दान कर दिया तथा रावणका सर्वनाश कर डाला )॥३॥ यहाँ, अर्थात् आपके दरवारमें की हुई चतुरता हजारों मूर्खता- के समान है। यहाँ तो सीधे-सादे सच्चे भावसे अपना दोष खीकार कर लेनेसे ही सारी मलिनता मिट जाती है । यदि तू प्रतिदिन जटायु, अहल्या और शवरीकी स्थितिको ) याद किये रहेगा तो खामीके प्रति तेरा प्रेम कभी कम नहीं होगा। (वे बेचारे सरल, अहंकारहीन शरणागत थे, इससे नाथने उन्हें सहज ही अपनाकर कृतार्थ कर दिया)॥४॥ आपका नाम कल्पवृक्षकी भौति समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देता है । नामका स्मरण करते ही