पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१६३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

विनय-पत्रिका १६८ तब तो पुण्यरूपी नखसे पापरूपी बडे-बड़े वनोंके समूह मुझसे कैसे कटेंगे? (मेरे जरा-से पुण्यसे भारी-भारी पाप कैसे दूर होंगे?) ॥ १ ॥ मन, वचन और शरीरसे किये हुए मेरे पापोंका वर्णन भी कौन कर सकता है ? एक-एक क्षणके पापोंका हिसाब जोडनेमें अनेक शेष, सरस्वती और वेद हार जायँगे ॥ २॥ ( मेरे पुण्योंके भरोसे तो पापोंसे छूटकर उद्धार होना असम्भव है ) यदि आपके मनमें अपने नामकी महिमा और पतितोंको पावन करनेवाले अपने गुणोंका स्मरण आ जाय तो आप इस तुलसीदासको यमदूतोंके दाँत तोडकर संसार-सागरसे अवश्य वैसे ही तार देंगे, जैसे अजामिल ब्राह्मणको तार दिया था ॥ ३॥ [९७] जो पै हरि जनके औगुन गहते। तौ सुरपति कुरुराज वालिसो, कत हठि वैर विसहते ॥ १॥ औ जप जाग जोग व्रत वरजित, केवल प्रेम न चहते। तौ कत सुर मुनिवर विहाय व्रज गोप-गेह बसि रहते ॥ २॥ जौ जह-तह प्रन राखि भगतको, भजन प्रभाउ न कहते । तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भॉति निवहते ॥ ३ ॥ जौ सुतहित लिये नाम अजामिलके अघ अमित न दहते। तो जमघट सॉसति-हर हमसे वृपभ खोजि खोजि नहते ॥ ४ ॥ जो जगविदित पतितपावन, अति वॉकुर विरद न बहते । तो वहुकलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न लहते ॥ ५ ॥ __ भावार्थ-( आप दासोंके दोषोंपर ध्यान नहीं देते ) हे रामजी ! यदि आप दासोंके दोष मनमें लाते तो इन्द्र, दुर्योधन