पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/८०

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विद्यापति ।।

As mannanaman

ठूती । १४३ बूझब छयल पन आज । राहि मनि रतने अनिल अति थतने वाञ्च सब रमणि समाज ॥ २ ॥ शिरिष कुसुम तनि अति सुकुमार धनि आलिङ्गव दृढ़ अनुरागे ।। निर्भय करव केलि केहो नहि बूझ मेलि भमर भरे माजरि न भॉगे ॥ पिरीतक बोले नियरे वइसीओबि नख हानि नव कोल ॥ नहि नहि करि धनि कपटे भूलबि जनु यदि कह कातर बोल ॥ ६ ॥ दूती । | १४४ कोमल तनु पराभवे पाऔब तेज न हलबि तेहु । भमर भरे कि माजीर भॉगए देखल कतहु केहु ॥ २ ॥ माधव बचन धरव मोर। नही नहि कय न पतिश्राएब अपद लागत भोर ॥ ४ ॥ अधर निरसि धुसर करके भाव उपजत भला । स्वने वने रति रभस अधिक दिने दिने ससि कला ॥ ६ ॥