पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/६२

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विद्यापति । दूती । | १ ०५ नहु तौरहि नामे जाव । तोरि कहिनी दिन गमाव ।। २ ।। सपनेहु तोर सङ्कम पाए । करने की नहिं की विसुनाए ॥ ४ ॥ किसखि पुछसि ताहेर कया। ताहि तह भलि तोरि अवथा ॥ ६ ॥ जाहि जाहि तुओं सड़ मेरी । चकित लोचन चउदिस हैरी ॥ ८ ॥ उठि आलिए अपनि छाप्रा । एतेहु पापिनि तोहि न दा ॥१०॥ (४) विसुनाए= विस्मृत होता है। (६) अचथी= अचस्था । (१०) दामा=दया। ठूती । जीवनचाहि यौवन बड़ रङ्ग । तचे यौवन यव सुपुरुख सङ्ग ॥ २ ॥ सुपुरुख प्रेम कबहु नहि छाड़ । दिने दिने चॉदकला सम बाढ़ ॥ ४ ॥ तुहु से नागरि कानु रसकन्द । बङ पुने रसवती मिले रसवन्त। ६ ॥ तुहुँयदि कहास करियअनुसँग।चोरि पिरीति होय लाख गुण रंग॥८॥ सुपुरुष ऐसन नहि जग माझ । अते ताहे अनुरत बरज समाज॥१०॥ भनइ विद्यापति इथे नहि लाज । रूप गुणवतिक इह बड़ काज ॥१२॥