पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/४२०

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४ ०० विद्यापति ।

। । । माधव । । । । । ? ' तिल एकं शयन ओत जिउ न सह न रहु दुहु तनु भन । माझे पुलक गिरि अन्तर मानिय'ऐसेन रहु निशि दीन ॥२॥ सजनि कोन पर जीयव कान । राहीं रहल दूरं हम मथुरापुर एतहु सहय परान ॥४॥ ऐसन नगर ऐसे नव नागरि ऐसन सम्पद मोर। राधा विनु सब चाधा मानिय नयन न तेजय नोर ॥६॥ सोइ जमुना जल सोइ रमनिगण सुनइते चमकितचीत । कह कविशेखर अनुभवि जानलाँ बड़क बड़इ पिरीत ॥८॥ । माधव ।। ७६१ रामा है सपथ करह तोर ।। से जे गुनवतिं गुन गनि गनि न जाने कि गति मोर ॥२॥ से सव सुमरि दहइ मदन हृदय लागल धन्ध । ' ताहि विनु हम जीवन मानिय मरन अधिक मन्द ॥४॥ सगर रजनि रोइ गमाओल सघन तेज निसास । " नयने नयने पुनु कि मिलव पुनु,कि पुरव आस ॥६॥