पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/४०१

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विद्यापति । |३८१ धरणी धरि धनि कत वैरि वैठइ पुन तहि उठइ नहि पारा ।। कातर दिठि कार चीदिश हरि हेरि नयने गलय जलधारा ॥६॥ तोहारि विरहे दीन ने क्षने तनु क्षीन चौदशी चॉद समान । भनइ विद्यापति शिवासिंह नरपति लछमी दैवी परमान ॥८॥ - - - दूती । ७५८ मलिन कुसुम तनु चीरे । करतल कमल नयन ढर नीरे ॥ २ ॥ कि कहब माधव ताही । तुय गुने लुबुधि मुगुधि भेलि राही ।। ४ ।। उर पर सामरी वेनी । कमल को जाने कारि नागिनी ॥ ६ ॥ के सखि ताकए निशाले । के नलिनी दुले कर बतासे ॥ ८ ॥ के बोल आएल हरी । समरि उठलि चिर नाम सुमरी ।।१४।। विद्यापति कवि गावे । विरह वेदन नि साख समुझावे ॥१२॥ -~-01--- दूती । • ७५६ माधव दुवरी पेखलु ताही । चौदशी चॉद जनि अनुसन क्षीयत ऐसन जीवय राही ।।२।। नियरे सखीगन वचन जो पुछत उतर न देयइ राधा । ही हरि हा हरि:अनुरखने तुय मुख हेरइते साधा ||४|