पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३७६

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३५८ विद्यापति । - ~ ~ 12:29, 17 February 2019 (UTC)नीलम (talk) २ ,, झम्पि घन गरजन्ति सन्तति भुवन भरि, वरसन्तिया । " , कन्त पाहुन काम दारुण सघने खर सर इन्तिया ॥४॥ कुलिश क्त शत पात मुदित मयूर नाचत मातियो । मच दादुरि डाके डाहुकि फाटि जाति छातिया ॥६॥ तिमिर दिग भरि घोर जामिनी अथिर विजुरिक पॉतिया । विद्यापति कह कैसे गमाओव हरि विनु दिन रातिया ॥८॥ " ७१६ । । । ' । राधा । । । खेदवे मोजे कोकिल अलिकुल वारव करकङ्कन झमकाई । । जखने 'जलदे धवला गिरि वरिसव तखनुक क्लोन उपाइ ॥२॥ गगन गरज घन सुनि भन शङ्कित वारिश हरि करु रावे । दखिन पवन सौरभे जदि सतरव दुहु मन दुहु विठुरावे ॥४॥ से सुनि जुवति जीव जदि राखति सुन विद्यापति वानी।। राजा सिवसिंह इ रस विन्दक मदने वोधि देव आनी ॥६॥ ७१७ राधा । अङ्कुर तपन तापे जद जारव कि करव वारद मेहे । इ नव जीवन विहे गमाओव कि करव से पिया नेहे ॥२॥ ।