पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३५७

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विद्यापति । ३३१ राधा । मधुपुर मोहन गेल रे मोरा विहरत छाति । गोपी सकूल विसरलनि रे जत छिल अहिवाती ॥ २ ॥ शतल छलहुँ अपने गृह रे निन्दइ गेलउ सपनाइ । करस छुटल परशमणि रे कोन गैल अपनाइ ॥ ४ ॥ कत क्वो कत सुमिरव रे हम भरिय गराणी । आनक धन सों धनवन्ती र कुवजा भैलि राणी ॥ ६ ॥ गोकल चान चकोरल रे चोरी गेल चन्दा । विड़ि चललि दुहु जोड़ी रे जीव दुइ गेल धन्धा ॥ ८ ॥ काक भाष निज भापह रे पहु आत मौरा । क्षीर खाड़ भोजन देव रे भरि कनक कटौरा ॥ ३० ॥ भनहि विद्यापति गाओल रे धैरज धर नारी । गोकुल होयत शोहान रे फेरि मिलत मुरारि ॥ ,, राधा । ६ ६४ प्रथम समागम भेल रे । हटन नव तनु नवं अनुराग रे । विन । भल रे । हठन रयन दिन ३ ॥ ३ ॥ २ । विनु परिचय म मागर ॥