पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३४०

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विद्यापति । राधा । ६३६ मञ छलि पुरुब पैम भरे भौरी । भान अछल पि आइति मौरी ॥ २ ॥ ए सखि सामि अकामिक गेला । जिवहु अराधन न अपन भेला ॥ ४ ॥ जाइते पुछलह्नि भलेओन मन्दा । मन वसि मनहि बढ़ाओल दन्दा ॥ ६ ॥ सुपुरुस जानि कयल हमें मेरी । पाओल पराभव अनुभव वेरी ॥८॥ तिला एक लागिरहल अछजीवे । विन्द सिनेह वरइ जनि दीवे ।।१०।। चॉद वदनिधन न झॉवह आने । तुअ गुन समरि आओव पुनुकाहे ॥१२॥ भनइ विद्यापति एहू रस जाने । राए सिवसिंह लखिमा देवि रमाने ॥१४॥ । राधा । ६४० कौतुक दुहु कुलकमल तियागल जे पद पङ्कज आस । पहुक भन दिन न गनल न गनल मरन तरास ॥२॥ सजनि निकरुण हृदय मुरारि । अब घर जाइत ठाम नहि पाविय परिजन देअइ गारि ॥४॥ गगन चाँद पानिमा वारले सगर नगर वेभार ।। अमिय घट वलि हाथ पसारल पाओल गरलक धार ॥६॥