पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३२९

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विद्यापति । तरुन तरुनि सङ्गे । रइनि खेपवि रङ्गे ॥१०॥ विरहि विपद लागि । केसु उपजल आगि ॥१२॥ कवि विद्यापतिभाना मानिनी जिवन जान ॥१४॥ नृप रुद्रसिंह वरु । मेदिनी कलप तरु ॥१६॥ सखी । अभिनव पल्लव वइसक देल । धवल कमल फुल पुरहर भेल ॥२॥ करु मकरन्द मन्दाकिनि पानि । अरुण अशौग दीप दिहु अनि ॥ ४ ॥ भाइ हे आज दिवस पुनमन्त । कुरिय चुमाओन राए वसन्त ॥ ६ ॥ सपन सुधानिध दधि भल भेल | भमि भमि भमरइ कोरइ देल ॥ ८ ॥ | केतु कुसुम सीदूर सम भास । केतकि धूलि विथुरलहु परवास ॥१०॥ भनइ विद्यापति कवि कण्ठहार । रस बुझ शिवसिंह शिव अवतार ॥१२॥ सखी । ६ १५ खन पवन वह दश दिश रोल । से जनि चादी भासा बोल ॥ २ ॥ भन्नभयं को साधन नहि आन । निरसावल से मानिनि मान ॥ ४ ॥ ३ है शीत वसन्त विवाद । कवने विचारव जय अवसाद ॥ ६ ॥ 8 दिश मध्ये दिवाकर भेल । दजवर कोक्लि साखिता देल ॥ ८॥ विपल्लव जपत्रस भाति । मधुकर माला ओखर पाति ॥१०॥ चादी तह प्रतिवादी भीत । शिशिर विन्दु हो अन्तर शीत ॥१२॥