पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३११

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विद्यापति ।

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विद्यापति । २८६ पुलकित भेल पयोधर गोर । दुगध मदन पुन ऑकुर तोर ॥ ८ ॥ वजइत वचने भेल स्वरभङ्ग । कदली दल जको कॉपय अङ्ग ॥१०॥ विद्यापति कविवर एह गाव । सकल अधिक भेल मनमथ भाव ॥१२॥ सखी । ५७६ | कह कह सुन्दरी रजनी विलास । कैसे नाह पूरल तुय आश ॥ २ ॥ कतहु जतने विहि करि अनुमान । नायर नायरी करल निरमान ॥ ४ ॥ अखिल भुवन माह तहु बर नारि । सुपुरुष नाह तोहे मिलल मुरारि ॥ ६ ॥ (राधा का उत्तर) याक पिरीत हम कहइ न पारे । लाख वयान विहि न देल हमार ॥ ८॥ करे धरि पिया मोर बैठाओल कोर । सुगन्धि चन्दने तनु लेपल मोर ॥१०॥ आपन मालांत माला हिंयसे उतारि । कण्ठे पहिराल जतने हमारि ॥१२॥ फुयल कवरी वान्धइ अनुपाम । ताहे वेढल चम्पक । 3 मधुरे दिठी हेरय च्यान । आनन्द जले परिपूरल नयाने ॥१६॥ चापात इह परसद्ध । धनी भुलल कहइते रजनीक रङ्ग ॥१८॥ भनइ विद्यापति इह परसङ्ग राधा । ५७६ गोर पयोधर कनक धराधर नागर थापल पानी । |