पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/३०९

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२८ विद्यापति ।

राधा । ५७४ | घूमे अचेतन पालझे शयन दीघल बहय शास । दीप कर लइ लुबुध माधव आगोल हमर पास ॥२॥ सखि हे कसे ऐसन ढीठ। अधिक लालसे हरपे परशे विषम तकर दीठ ॥४॥ जागइव डरे । | लह लहु करे बसन कयल दृरे । कनक गागरि | वेकत निहारि | निज मनोरथ पूर ॥६॥ झटिते जागल | भरमे कहल चोर । अन्धारे पइसल डरे चोर पासे से मोरे कयल कोर ॥८॥ बॉधि भुजपाशे हासिक रभसे विलसे अधिक सुख । वेकत कह्य चम्पति पति चारक निलज मुख ॥१०॥ दीपक छटाय