पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/२०५

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विद्यापति । १८६ माधव । ३७१ अरे अरे भमरा तोळे हित हमरा बँउसि आनह गजगामिनि रे। आजु कि रूसलि कालि जो बैंउसबि तीति होइति मधु जामिनि रे ॥२॥ तीति रजनि तिनि जुगे जनि दिठिहुक ओत- देसॉतर रे। सरोबर सोसे कमल असिलाएल नगर उजलि भेल पॉतर रे ॥४॥ एकसर मनमथ दुइ जिव मारए अपन अपन भिन वेदन रे। दुइ मन मेलि कमने वेकताब दारुन प्रथम निवेदन रे ॥६॥ मानक भञ्जन जसु गुन रञ्जन विद्यापति कवि गोल रे।। लखिमा देबपति सिवसिंह नरपति पुरुब जनम तपे पाओल रे ॥८॥ कवि । ३७३ अवनत वयनी धरनि नखे लेखि । जे कह श्याम नाम ताहि नहि पेखि ॥२॥ अरुन बसन परि विगलित केश । अभरने तेजल झॉपल बेश ॥४॥ नीरस अरुन कमल वर बयनि । नयन नीरे बहि जात धरनि ॥६॥ ऐसन समय आौल बनदेवि । कहय चलह धनि भानुक सेवि ॥८॥ अवनत चयनी उतर नहि देल । विद्यापति कह से चलि गेल ॥१०॥ सखी ।। कतए अरुन उदयाचल उगल कतए पछिम गेल चन्दा । कतय भमर कोलाहले जागत सुग्वे सुत्थु अरविन्दा ॥२॥