पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/१७५

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

________________

विद्यापति ।। •••••• • • • • • • • • ••• ••• • • •नीलम (talk) राधा । ३३७ कुसुम तोरए गेलाहु जाहाँ । भमरे अधर खराडल ताहाँ ॥ २ ॥ | ते चलि अयलाहुँ जमुना तीर । पवने हरल हृदय चीर ।। ४ ।। ए सखि सरुप कहल तोहि । आन किछु जनु वोलसि मोहि ॥ ६ ॥ | हार मनोहर वेकत भेल । उजर उरग संसअ गेल ।। ६ ।। तें धसि मजुरे जोडल झॉप । नखर गाड़ल हद कॉप ||१०|| भने विद्यापति उचित भाग । वचन पाटने कपट लाग ॥१२॥ राधा । ३२८ ननद सरुप निरुपह दोस। विनु विचारे वेभिचार बुझवह सासु कराह रोसे ॥ २ ॥ कउतुके कमल नाल सञो तोरल करए चाहल अवतसे । रोखे कोख सञो मधुकर धाओल तेहि अधर करु दसे ॥ ४ ॥ सरोवर घाट बाट कण्टक तरु देखहि ने पारल आगू । सॉकरि बाट उवटि कह चललाहु ते कुच कण्टक लागू ॥ ६ ॥ गरु कुम्भ सिर थिर नहि थकिए ते उधसल केशपाशे । सखि सञो हमे पाछु पडलिहु ते भेल दीघ निसासे ॥ ६॥ पय अपवाद पिशुने परचारल तयिह उतर हम देला । अमरख चाहि धैरज नहि रहले ते गदगद सर भेला ॥ १० ॥ भनइ विद्यापति सुन वरजवउति इ सवे राखइ गोइ ।। ननदी सञो रस रीति चढ़ाव गुपुत बेकत नहिं होई ॥ १२ ॥

=

=