पृष्ठ:विद्यापति ठाकुर की पद्यावली.djvu/११०

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૩ ૦ ૨ विद्यापति । - - - राधा । १६.६. कि कहब हे सखि रजनिक बात । वड दुखे गमात्रओल माधव सात ॥ २॥ करे कच झाँपय अधर मधुपान । वदने वदन देय वधय परान ॥ ४ ॥ नव यौवन ताहे रस परचार । रति रस न जानय कानु से गमार ॥ ६ ॥ मदने बिभोर किछुओ न जान । कतए विनति कर तैयो नहिं मान ॥६॥ भनइ विद्यापति सुन वर नारि । तुहु मुगुधिनि सोइ लुबुध मुरारि ॥१॥ राधा । २०० ने कर ने कर सखि मोहि अनुरोधे । कि करब मह तकर परबोधे ॥ २ ॥ अलप बयस म कानु से तरुना । अतिहु लाज डर अतिहु करना ।। लोभै निठुर हरि क्युलन्हि केलि । कि कव यामिनिजत दुख देलि ॥ ६ ॥ दृठ भेल रस हम हरल गेयान । निविवन्ध तोड़ल कखन के जान ॥" देल आलिङ्गन भुज युग चापि । तहि खन हृदय मझु उठल कापि नयने वारि दरशाग्रोल रोइ । तचहुँ कान्हू उपशम नहि होई अधर निरस मझ करलनि मन्दा । राहु गरासि निशि तेजल चन्द कुचयुगे देल नख परहारे । केशरि जनि गज कुम्भ बिदार ॥ भनइ विद्यापति रसवति नारि । तुहु से चेतनि लुदुध मुरारि ॥