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विदेशी विद्वान्


अबलाजन की बात साधारण है; कुमुदिनियों की विशेष। कवि ने साधारण से विशेष की उद्भावना की है; विशेष से साधारण की नहीं। सो आचार्य्य मुग्धानल ने सभी उलट-पुलट कर डाला।

शकुन्तला में एक पद्य सर्वोत्तम समझा जाता है। वह उस समय का है जिस समय पति के घर जाने के लिए शकु- न्तला कण्व से बिदा होती है। इस श्लोक का उत्तरार्द्ध है―

वैलव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्याकसः
पीड्यन्ते गृहिण कथँ न तनयाविश्लेपदुःरवैर्नवैः।

अर्थात् ――

मोसे बनवासीन जो इतौ सतावत मोह।
तौ गेही कैसे सहे दुहिता प्रथम विछोह॥

यह पद्य पदजीवी है। इसमें “गृहिणः” पद सारे श्लोक का जीव है। इसी से राजा लक्ष्मणसिंह ने इसे अपने अनु- बाद से नहीं जाने दिया। देखिए आपके दोहे में “गेही” विद्यमान है। पर भारतवर्ष के पण्डितो पर सूक्ष्मदर्शी न होने का वृथा कलङ्क लगानेवाले मुग्धानल महोदय को यह बात नहीं सूझी। आपने “गृहिणः” पद की योग्यता को बिलकुल न जानकर उसे अनुवाद से निकाल बाहर किया है। उसकी जगह पर आपने रक्खा क्या है “फ़ादर”―पिता! आपने पूर्वोक्त पवार्द्ध का अनुवाद किया है―

But if the grief
of an old forest hermit is so great,