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मुग्धानलाचार्य्य

‘विक्रमाङ्कदेवचरित’ का सम्पादन किया है। उस काव्य के १८ वे सर्ग मे कवि बिल्हण ने अपना चरित लिखा है। उसमें एक जगह बिल्हण ने कहा है―

भोजः क्ष्माभृत् स खलु न खलैस्तस्य साम्यँ नरेन्द्रै-
स्तत्प्रत्यक्ष किमिति भवता नागतँ हा हतास्मि।
यस्य द्वारोड्डमरशिखरक्रोडपारावतानाँ
नादब्याजादिति सकरुणँ व्याजहारेच धारा॥

इसका तात्पर्य यह है कि धारा नगरी मानो अफ़सोस के साथ बिल्हण से कहती है कि तू भोज के जीते जी क्यों न आया? परन्तु बूलर साहब ने―“तत्प्रत्यक्षं किमिति भवता नागतँ हा हतास्मि” का अर्थ लगाया कि―तू धारानगरी मे जाकर भोज से क्यो न मिला? बूलर साहब ख़ुद तो गढ़े में गिरे ही; पर अकेले नहीं गिरे; साथ हमे भी लेते गये। “विक्रमाङ्कदेव- चरित-चर्चा” लिखने के पहले हमने इस काव्य को अच्छी तरह पढ़ा। जहाँ यह धारा-नगरी-विषयक श्लोक मिला वहाँ हाशिये पर हमने लिख दिया―“धारा को गया”। पर जब पुस्तक लिखने बैठे तब वह बात ध्यान से उतर गई। बूलर साहब की भूमिका के आधार पर हमने लिख दिया कि भोज से मिलने के लिए बिल्हण धारा नगरी को गया ही नहीं। यह भूल हमे मालूम कब हुई जब पण्डित पद्मसिहजी ने हमारी पुस्तक के हाशिये पर हमारा नोट देखा और हमें उसकी सूचना दी।४