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बुकर टी० वाशिगटन
उपसंहार

सोचने की बात है कि जिस आदमी का जन्म दासत्व मे हुआ, जिसको अपने पिता या पूर्वजो का कुछ भी हाल मालुम नहीं, जिसको अपनी बाल्यावस्था में स्वयं मज़दूरी करके पेट भरना पड़ा, वही इस समय अपने आत्म-विश्वास और आत्म- बल के आधार पर कितने ऊँचे पद पर पहुँँच गया है। बुकर टी० वाशिगटन का जीवनचरित पढ़कर कहना पड़ता है कि "नर जो पै करनी करे तो नारायण ह्वै जाय।" प्रतिकूल दशा में भी मनुष्य अपनी जाति, समाज और देश की कैसी और कितनी सेवा कर सकता है, यह बात इस चरित से सीखने योग्य है। यद्यपि हमारे देश मे अमेरिका के समान दासत्व नहीं है तथापि, वर्तमान समय में, अस्पृश्य जाति के पॉच करोड़ से अधिक मनुष्य सामाजिक दासत्व का कठिन दुःख भोग रहे हैं। क्या हमारे यहाँ, वाशिगटन के समान, इन लोगों का उद्धार करने के लिए―सिर्फ़ शुद्धि के लिए नहीं―कभी कोई महात्मा उत्पन्न होगा? क्या इस देश की शिक्षा-पद्धति मे शारीरिक श्रम की ओर ध्यान देकर कभी सुधार किया जायगा? जिन लोगों ने शिक्षा द्वारा अपने समाज की सेवा करने का निश्चय किया है क्या वे लोग उन तत्त्वो पर उचित ध्यान देगे जिनके आधार पर हैम्पटन और टस्केजी की संस्थाये काम कर रही हैं? जिस समय हमारे हिन्दू और मुसलमान भाई अपने लिए स्वतन्त्र विश्वविद्यालय स्थापित करने का यत्न कर रहे हैं