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विदेशी विद्वान्


लेडियाँ मुअज्ज़ज़ महवश रश्केहूर, एकबारगी जैसे कोई कल को खींचता हो, उठ उठ खड़ी हुई कि ट्रेन शाही भी, जैसे कि मिहर अज़ मतलै अनवार दर प्रायद, तालै हुई। रोज़े इन्तिज़ार आख़िर और शाने इज़तिरार को सहर-

दोबारा लव न कुशायद सदफ व अबरे बहार,
करीम सायले खुदरा ग़नी कुनद एकबार ।

एक हलचल सी हुई। हत्ता कि गाड़ियों के घोड़े भी टापैं मारने लगे और सभी की आँखें नरगिसवार एक तरफ़ तरतीबवार जम गई।

इटालियन आपरा के तमाशे में शाह का जाना

तो क्या देखते हैं कि सात सौ परीज़ाद गुलअन्दाम मिहर- चेहरा जुहरा-जबी माह-ताबॉ व खुरशेदे दरूख्शॉ उनपै शैदा हैं। हर एक परी हाथ जमुर्रद और मरवारीद और इल्मास टके लगाये हुए थी। ज़्याये गयास मे ऐसा मालूम होता था कि हजारों माहताब निकले हैं। जो जो राग और स्वाॅग और करतब और तमाशे दिखलाये कि बादशाह और हमराही हैरान हो गये। इलाही यह ख्वाब है। ये सचमुच के आदमजाद हैं या परियों का अखाड़ा उतरा है। खुसूसन जब परियाँ तार के ज़ोर से मिस्ल तायरों के उड़ती थी यकायक वादशाह और सब इमराही के जवान से “वाह" “वाह" की सदा बलन्द हुई। अगर शिम्मा उसका बयान लिखू तो कलम विशिकन, स्याही रेज़, काग़ज़ सोज, दम दरकश का आलम हो ।