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टीका बनाई। उसकी सभा अनेक विद्यार्थियों से पूर्ण रहती थी। उसकी स्त्री का नाम नागादेवी था।

उस महात्मा के बिल्हण नामक पुत्र हुआ। जब से उसने मूंज की मेखला धारण की तभी से वेद की ऋचाओं के चित्र विचित्र उच्चारण के बहाने सरस्वती का कङ्कण उसके मुख में बजने लगा। सांग वेद, सांग व्याकरण और सम्पूर्ण साहित्य-शास्त्र उसके सर्वस्व हुए। उसकी विद्वत्ता की थाह लेना असम्भव हुआ। सच तो यह है कि ऐसा कोई भी विषय न था जो उसके बुद्धिरूपी निर्दोष दर्पण में प्रतिबिम्बित न हुआ हो। उसकी सरस और मधुर कविता उसकी कीर्ति के साथ देशदेशान्तरों में व्याप्त हो गई। उसके बड़े भाई का नाम इष्टराम था। अनेक राजाओं की सभाओं का वह आभूषण था। वह भी महाविद्वान् और महाकवि था। उसके छोटे भाई का नाम आनन्द था। उसके साथ विवाद करनेवाले कवियों की कीर्ति उसकी उक्तिरूपी कुल्हाड़ी से कट जाने पर फिर कभी न जुड़ सकी।

काश्मीर में अपनी कीर्ति को सब ओर फैला कर बिल्हण ने देशान्तर के लिए प्रस्थान किया।

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