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श्री हर्ष


इसके अनन्तर अनेक ज्योतिषियों से शुभ दिन मालूम कर कूचदिग्विजय के लिये कूच आरम्भ कर दी गई। सबसे पूर्व उसने थानेश्वर से थोड़ी दूर सरस्वती नदी के तटस्थ मन्दिर के पास अपना पढ़ाव डाला। वहां का ग्राममुखिया उसके सत्कार के लिये आया और प्रथानुसार एक स्वर्ण मुद्रा भेंट की। यह स्वर्ण मुद्रा विशेष कर इसी अवसर के लिये ही ढलवाई गई थी। इस पर बैलकी आकृति थी। हर्ष जब इस मुद्रा को लेने लगा तब उसके हाथ से फिसल कर वह कीचढ़ में मुखके बल गिर पड़ी और वहां बैल की आकृति पड़ गई। उपस्थित जनसमूह ने इसे अपशकुन समझा परन्तु हर्ष बोला कि यह शकुन तो यह बतलाता है कि केवल मेरे आधिपत्य का ही प्रभाव सारी दुनिया पर पड़ेगा" हर्ष जैसे दूरदर्शी बलवान राजा को कोई विशेष उपदेश की आवश्यकता न होने पर भी उसके मंत्रियों ने उसे प्राचीन दृष्टान्तों द्वारा दुनिया के छल कपट इत्यादि से सावचेत रहने की अनुमति दी। इस उपदेश को वह ग्रहण कर दिग्विजय के लिये निकल पड़ा। प्रथम वह