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वरदान
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आज प्रातःकाल कल की बची-बचायी रस्में पूरी हुई, जिनको यहा कढाई देना कहते हैं। मेरे द्वार पर एक भट्ठ खोदा गया और उस पर एक कड़ाह दूध से भरा हुआ रखा गया । काशी नाम का एक भर है । वह शरीर में भभूत रमाये आया । गाव के आदमी टाट पर बैठे। शख बजाने लगा । कडाह के चतुर्दिक माला-फूल बिखेर दिये गये । जब कड़ाह में खूब उबाल आया तो काशी झट उठा और जय कालीजी की कहकर कड़ाह मे कूद पड़ा । मैं तो समझी, अब यह जीवित न निकलेगा । पर पाँच मिनट पश्चात् काशी ने फिर छलॉग मारी और कड़ाह के बाहर था । उसका बाल भी बाँका न हुआ। लोगों ने उसे माला पहनायी। वे कर बाँधकर पूछने लगे--'महाराज । अबके वर्ष खेती की उपन कैसी होगी ? पानी कैसा वरसेगा ? बीमारी आयेगी या नहीं ? गाँव के लोग कुशल से रहेंगे ? गुड़ का भाव कैसा रहेगा ?' आदि । काशी ने इन सब प्रश्नों के उतर स्पष्ट कर किंचित् रहस्यपूर्ण शब्दों में दिये । इसके पश्चात् समा विसर्जित हुई । सुनती हूँ, एसी क्रिया प्रति वर्ष होती है। काशी की भविष्यवाणियाँ सब सत्य सिद्ध होती है और कभी एकाध असत्य भी निकल जाय तो काशी उनका समाधान भी बड़ी योग्यता से कर देता है। काशी बड़ी पहुँच का आदमी है | गाँव मे कहीं चोरी हो, काशी उसका पता लगा देगा । जो कार्य पुलिस के भेदियों से पूरा न हो, उसे वह पूरा कर देता है । यद्यपि वह जाति का भर है, तथापि गॉव में उसका बड़ा आदर है । इन सब भक्तिया का पुरस्कार वह मदिरा के अतिरिक्त और कुछ नहीं लेता । नाम निकलवाइये, पर एक बोतल उसकी भेंट कीजिये । आपका अभियोग न्यायालय मे है, काशी उसके विजय का अनुष्ठान कर रहा है । वस, आप उसे एक बोतल लाल जल दीजिये ।

होली का समय अति निकट है । एक सप्ताह से अधिक नही । अहा! मेरा हृदय इस समय कैसा खिल रहा है? मन मे आनन्द-प्रद गुदगुदी हो रही है। आखे तुम्हे देखने के लिए अकुला रही है। यह सप्ताह बड़ी