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वरदान
८२
 

अपने को सुखाकर इस दशा तक पहुँचाया था―रो रोकर उससे कह रही थी―लल्लू! चुप रहो, ईश्वर जानता है, मैं भली-भाँति अच्छी हूँ। मानो अच्छा न होना उसका अपराध था । स्त्रियों की संवेदनशीलता कैसी कोमल होती है। प्रतापचन्द्र के एक साधारण सकोच ने विरजन को इस जीवन से उपेक्षित बना दिया था। आज आँसू की कुछ बूंदों ने उसके हृदय के उस सन्ताप उस जलन और उस अग्नि को शान्त कर दिया, जो कई महीनों से उसके रुधिर और हृदय को जला रही थी। जिस रोग को बड़े बड़े वैद्य और डॉक्टर अपनी औषध तथा उपाय से अच्छा न कर सके थे, उसे अश्रुबिन्दुओं ने क्षण भर में चङ्गा कर दिया। क्या यह पानी के बिन्दु अमृत के बिन्दु थे?

प्रताप ने धीरज धरकर पूछा―विरजन। तुमने अपनी क्या गति बना रखी है ? विरजन(हॅसकर)―यह गति मैंने नहीं बनायी, तुमने बनायी है।

प्रताप―माताजी का तार न पहुँचता तो मुझे सूचना भी न होती।

विरजन―आवश्यकता ही क्या थी? जिसे भुलाने के लिए तुम प्रयाग चले गये, उसके मरने जीने की तुम्हें क्या चिन्ता?

प्रताप―बातें बना रही हो। पराये को क्यों पत्र लिखतीं?

विरजन―किसे आशा थी कि तुम इतनी दूर से आने का या पत्र लिखने का कष्ट उठाओगे? जो द्वार से आकर फिर जाय और मुख देखने से घृणा करे उसे पत्र भेजकर क्या करती?

प्रताप―उस समय लौट जाने का जितना दु.ख मुझे हुआ मेरा चित्त ही जानता है। तुमने उस समय तक मेरे पास कोइ पत्र न भेजा था। मैने समझा, अब सुध भूल गयीं।

विरजन―यदि मै तुम्हारी बातों को सच न समझती होती तो कह देती फि ये सब सोची हुइ बातें है।

प्रताप―भला जो समझो, अब यह बताओ कि कैसा जी है? मैने