यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४७
ईर्ष्या
 

एक दिन वह स्कूल से आकर अपने कमरे में बैठा हुया था कि विरजन आयी। उसके कपोल अश्रु से भीगे हुए थे और वह लम्बी-लम्बी सिसकियाँ ले रही थी। उसके मुख पर इस समय कुछ ऐसी निराशा छायी हुई थी और उसकी दृष्टि कुछ ऐसी करुणोत्पादक थी कि प्रताप से रहा न गया। सजल नयन होकर बोला―क्यों विरजन! रो क्यों रही हो? बिरजन ने कुछ उत्तर न दिया, वरन् और बिलख-बिलखकर रोने लगी। प्रताप का गाम्भीर्य जाता रहा । वह निस्सकोच होकर उठा और विरजन की आँखों से आँसू पोंछने लगा। विरजन ने स्वर सँभालकर कहा―जल्लू , अब माताजी न जायेंगी, मैं क्या करूँ? यह कहते-कहते वह फिर सिसकियाँ भरने लगी!

प्रताप यह समाचार सुनकर स्तब्ध हो गया। दौड़ा हुश्रा विरजन के घर गया और सुशीला की चारपाई के समीप खड़ा होकर रोने लगा। हमारा अन्त समय कैसा धन्य होता है! वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अहित- कारियों को खीच लाता है, जो कुछ दिन पूर्व हमारा मुख नहीं देखना चाहते थे, और जिन्हें इस शक्ति के अतिरिक्त संसार की कोई अन्य शक्ति पराजित न कर सक्ती थी। हाँ, यह समय ऐसा ही बलवान है और बड़े- बड़े बलवान शत्रुओं को हमारे अधीन कर देता है। जिन पर हम कभी विजय न प्राप्त कर सकते थे, उन पर हमको यह समय विजयी बना देता है। जिन पर हम किसी शस्त्र से अधिकार न पा सकते थे, उन पर समय शरीर के शक्तिहीन हो जाने पर भी हमको विजयी बना देता है। आज पूरे वर्ष भर के पश्चात् प्रताप ने इस घर मे पदार्पण किया। सुशीला की आँखें बन्द थीं, पर मुखमण्डल ऐसा विकसित था, जैसे प्रभातकाल का कमल। आज भोर ही से वह रट लगाये हुए थी कि लल्लू को दिखा दो। सुवामा ने इसीलिए विरजन को भेजा था।

सुवामा ने कहा―बहिन! आँखें खोलो। लल्लू खड़ा है।

सुशीला ने आँखें खोल दीं और दोनों हाथ प्रेम-बाहुल्य से फैला दिये।